केन-बेतवा लिंक परियोजना से एमपी के साथ यूपी को कैसे मिलेगा फायदा?
क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना?
इस परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व में केन नदी पर 77 मीटर ऊंचाई और 2.13 किलोमीटर लंबाई वाला बांध बनाया जाएगा। इसे दौधन बांध कहा जाएगा। इसके साथ ही दो टनल का निर्माण कर बांध में 2,853 मिलियन घन मीटर पानी को स्टोर किया जाएगा।
क्यों पड़ी इस परियोजना की जरूरत?
भारत इतना विशाल देश है कि यहां काफी विविधता पाई जाती है। किसी हिस्से में सूखा पड़ जाता है, तो कहीं ज्यादा पानी की वजह से बाढ़ आ जाती है। इस समस्या को कम करने के लिए नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान बनाया गया था।
कहां है केन और बेतवा नदी का उद्गगम स्थल
- केन बुंदेलखंड में बहने वाली प्रमुख नदी है। इसका उद्गम कैमूर पर्वतमाला से होता है। मध्य प्रदेश ने निकलकर यह नदी उत्तर प्रदेश के बांदा में यमुना से मिल जाती है। इसे यमुना की अंतिम उपहायक नदी कहा जाता है।
- बेतवा भी एक महत्वपूर्ण नदी है। इसे बुंदेलखंड की गंगा कहा जाता है। इसकी शुरुआत रायसेन जिले के कुमरा गांव के समीप विन्ध्याचल पर्वत से होती है। यह नदी भोपाल, ग्वालियर, झांसी, औरेया और जालौन से होते हुए हमीरपुर के पास यमुना में मिल जाती है।
पन्ना टाइगर रिजर्व पर असर
वैसे तो सुनने में ये काफी अनोखा लगता है कि सभी नदियों को एक-दूसरे से जोड़ दिया जाएगा। लेकिन ये उतना आसान भी नहीं है। जिन 30 रिवर इंटरलिंकिंग प्रोजेक्ट का प्लान तैयार किया गया है, उसे पूरा करने में दशकों लग जाएंगे।
एक समस्या और है। इन प्रोजेक्ट से जितना फायदा होगा, उतना ही नुकसान होने की भी संभावना है। केन-बेतवा लिंक परियोजना की ही बात करें, इससे सबसे ज्यादा नुकसान पन्ना टाइगर रिजर्व को होगा। इसके चलते रिजर्व का 57.21 वर्ग किलोमीटर हिस्सा पानी में डूब जाएगा।
लिंकिंग प्रोजेक्ट के फायदे-नुकसान
ये तो सच है कि अगर नदियों को एक-दूसरे से कनेक्ट कर दिया जाए, तो इससे कई इलाकों का सूखा समाप्त हो जाएगा और क्षेत्र का विकास होगा। नई पनबिजली परियोजनाएं शुरू हो सकेंगे और पीने के पानी की किल्लत भी दूर हो जाएगी। लेकिन ऐसी परियोजनाओं के नुकसान भी हैं।
इससे जंगल और दूसरे कई इलाके डूब क्षेत्र में बदल सकते हैं। नदियों को जोड़ने से उनकी पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ेगा। दुर्लभ मछलियों और जीवं-जंतुओं पर संकट आ सकता है। एक इलाके का पानी दूसरे इलाके में पहुंचने से हवा के पैटर्न में भी बदलाव आ सकता है, जिससे मौसम और मिट्टी की नमी पर असर पड़ सकता है।
